Recent Post

जिंदगी में बड़ी शिद्दत से निभाओ अपना किरदार, कि परदा गिरने के बाद भी तालियां बजती रहें.!

Sunday, 18 February 2018

पलायन का दंश झेलता-मेरा गाँव

रोजगार के लिए प्रवास की पीड़ा को झेलते, मरते - उजड़ते गाँव के सन्नाटे की चीख को मैं हेमन्त सिंह गढ़िया अपनी इस छोटी सी कविता के माध्यम से व्यक्त करने की कोशिश की हैं। गोबर माटी से लिपा वो खुला आँगन कहाँ जहाँ सब मिलकर अपना सुख दुःख सांझा करते थे ??? अब तो आधुनिकता बस एकांत कोना अपना पर्सनल स्पेस खोजती है ... 


" मानता हूँ मैं  प्रगति की बात
मेरे इस देश में यह जरूर हुई है 

लेकिन मेरा गाँव  
इस प्रगति की वजह से वीरान होता गया

वहाँ  रहने वाला आदमी बूढ़ा हो गया  
वहाँ  का बच्चा वहाँ  नहीं

किसी नगर - महानगर में समय से पहले जवान हो गया।
मैं मानता हूँ की देश - दुनिया में खेती में बदलाव आया है 
किन्तु मेरे गाँव  में जगह - जगह " बासिल " उग आया है  
बंजर होती गयीं माथि और मुड़ी स्यार
जिनमें कभी लहलहाती थी फसलें  
मेरे ज़माने के बच्चे गाया करते थे गीत 
और नज़र आतीं थी भेड़ - बकरियों के रेवाड़े

मैं यह भी जानता हूँ कि देश - दुनिया में औद्योगिक क्रांति हुई है 
लेकिन मेरे गाँव  में तो अब नहीं रहे वे टम्टेलुहारकोली और सुनार 
जो बनाते थे बर्तनखेती के लिए लौह औजार 
ओढ़ने के लिए ऊनी कम्बल और दुलहनों के लिए जेवरात 
वे न जाने कहाँ  चले गए,
तरसता है मेरा मन उन्हें देखने के लिए।
मुझे यह  पता है वहाँ  अब अपनी सरकार है 
मेरे गाँव में अब पुलिस चौकी है

जिसमें एक सिपाही सोया रहता है 
एक स्कूल है जिसमें अध्यापक कभी -कभार आता है 
दस किलोमीटर दूर एक अस्पताल है ।
जहाँ  डाक्टर नहीं मिलता है
कुछ बूढ़े मर्द,कुछ महिलाएँ और कुछ बच्चे हैं 
जो सरकारी सस्ता आटा - चावल खाते हैं
अब वो भी कई-कई महीने रुक जाता हैं

दिन काटते हैंकाम करने के बजाय जूँ मारते हैं। 

दरअसल,  मेरा गाँव  बूढ़ा हो गया है 
उसकी मौत की खबर आएगी 
यह तो मैं जानता हूँ ;
लेकिन कब ?
इतना नहीं जानता

दरअसलमैं भी तब-तक बूढ़ा हो जाऊँगा
मैं कैसे बता सकता हूँ - पहले कौन मरेगा ?

मैं या मेरा गाँव  खैरखबर मेरी मिले या मेरे गाँव  की 
इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा 
इस देश को न मेरी जरूरत है न मेरे गाँव  की !
Photo by- Hemant Singh Gariya
Village- Lili, Kapkote, Bageshwar


1 comment: