जब हम सब दोस्त अपनी-अपनी मंजील पर पहुच जाएगे ।
अकेले जब भी होगे साथ गुजरे हुए लम्हे याद आएगे ।
पैसे तो बहुत होगे पर सायद खच॔ करने के लिए लम्हे कम पड़ जाएगे ।
एक कप चाय यार दोस्तो की याद दीलाएगी ।
यही सोचते-सोचते फीर से आँखे नम हो जाएगी ।
दील खोल कर इन लम्हो को जीलो यारो ।
जिन्दगी अपना इतिहास फिर नही दुहराएगी
"क्या फर्क पड़ता है,
हमारे पास कितने लाख,
कितने करोड़,
कितने घर,
कितनी गाड़ियां हैं,
खाना तो बस दो ही रोटी है।
जीना तो बस एक ही ज़िन्दगी है।
फर्क इस बात से पड़ता है,
कितने पल हमने ख़ुशी से बिताये,
कितने लोग हमारी वजह से खुशी से जीए ..
क्या खुब लिखा है किसी ने ...
"बक्श देता है 'खुदा' उनको, ... !
जिनकी 'किस्मत' ख़राब होती है ... !!
वो हरगिज नहीं 'बक्शे' जाते है, ... !
जिनकी 'नियत' खराब होती है... !!"
न मेरा 'एक' होगा, न तेरा 'लाख' होगा, ... !
न 'तारिफ' तेरी होगी, न 'मजाक' मेरा होगा ... !!
गुरुर न कर "शाह-ए-शरीर" का, ... !
मेरा भी 'खाक' होगा, तेरा भी 'खाक' होगा ... !!


No comments:
Post a Comment